हॉल में ही मैं सिंगापुर गया था - ये मेरी पहली बिदेश यात्रा थी अतः बहुत ही उत्साहित होना स्वाभाविक है । क्या खुबसूरत शहर - क्या सुंदर मनोरम दृश्य, मन को मोहित कर देने वाला नजारा । ऊँचे - ऊँचे गगन चुम्बी इमारतें - वास्तु कला का अद्वुत संग्रह । खुबसूरत चौडी सड़कें । सबकुछ एकदम ब्यबस्थित । अनुशाशित और पढ़े लिखे लोग । सब अपने काम में ब्यस्त । पर ये क्या - मजदूरी का काम शिर्फ़ भारत और बांग्लादेश के लोगों के जिम्मे --
पता है क्यों - लगभग शिर्फ़ ८०० बर्ग मील में फैले इस छोटे से द्वीप में पढ़े लिखे लोग ९७ % हैं इसलिए कोई भी मजदूरी या इस तरह का छोटा काम नही करता । शिक्षा यहाँ मुफ्त नही मिलती और न ही सरकार मुफ्त देती है पर अनिवार्य है अतः इसका पुरा इंतज़ाम है की कोई भी अनपढ़ न रहे।
मेरे गाइड ने बताया के चुकी यहाँ सब पढ़े लिखे ही हैं इसलिए हम लोग इंडिया से मजदुर लाते हैं जो वहां बहुतायत में उपलब्ध हैं, गरीबी और अनपढ़ होने की बजह से । वे ज्यादा कमाने के लिए तीन - चार घंटे ज्यादा काम भी करते हैं और अधिक कमाने के लालच में यहाँ टिके भी रहते हैं जिससे सिंगापुर के निर्माण का काम चलता है। और फिर सिंगापुर के डॉलर का मूल्य रूपया के मुकाबले बहुत अधिक है ये दूसरा आकर्षण है।
ये एक नंगा सच है जिसे नाकारा नही जा सकता पर एक सबक तो लिया ही जा सकता है इस छोटे से देश से -
किसी भी देश और वहां की जनता की तरक्की के लिए उचित शिक्षा उतनी ही जरुरी है जितना की भोजन , आवास और वस्त्र --- और सबसे ज्यादा स्वाभिमान -----
ये हैं मेरे बिहारी विचार ---
अवधेश
Tuesday, September 1, 2009
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